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Saturday, August 19, 2017

शबनमी रोशनी की कुछ बूंदें

श्वेत, सर्द आनन्दमय 

चाँद की मोहब्बत भरी रात 

या कहूँ दर्द भरी रात 

इस चमकीली रात में 

बूँद बूँद झरती चाँदनी 

जहां चाँद से जुदा होती 

सुदूर धरती पर कहीं जाकर 

दर -ब -दर ठिकाना ढ़ूढ़ती 

कभी घास पर जा बैठती 

कभी फूलो की पंखुड़ियों पर सजती 

दूर धरा से चाँद को निहारती 

होकर रागमय आनन्द उठाती 

न उसे मृत्यु का भय 

न ही अस्तित्व मिटने का अफसोस 

न ही अनभिज्ञ सूर्य के सत्य से 

बस हैं चन्द्र के प्रेम में बाँबरी 

करके बलिदान अपने जीवन का 

चन्द्र के लिए सूर्य से जीवनदान है मांगती 

अपने अनन्त प्रेम को जीवित रख सके 

ताकि कल रात फिर मिल सके 

रागिनी बनकर, रोशनी बनकर 

और फिर मिट सके शबनमी मोती बनकर ।

      -आस्था गंगवार © 

Wednesday, February 1, 2017

वो मेरे दिल से वकिफ़. . .

वो मेरे दिल से वाकिफ 

मैं उसकी रूह से वाकिफ 

होती कुछ पल की तकरार 

फिर उमङता बेइंतहा प्यार 

इश्क है बंदिशो से आजाद 

शब्दो से नहीं होता उसे आघात 

मोहब्बत की नहीं कोई परिभाषा 

एहसास ही है उसकी भाषा 

जो दो दिल है समझते 

एक दूसरे को है लिखते पढते 

ये जिस्म है बस एक जरिया 

रूह ही है असली दरिया 

जहाँ गिरकर नहीं कोई निकलता 

सुकून बस डूबकर ही है मिलता 

जमाने की नहीं जिसे परवाह 

चाहत ही है जहाँ दरगाह 

मैं ऐसे इश्क से वाकिफ 

ऐसा इश्क मुझसे वाकिफ….. 

आस्था गंगवार

Sunday, January 15, 2017

देखकर तेरे नयनो में . . .

देखकर तेरे नयनो में जमाना भूल जाती हूँ 

तेरी यादो के गुलिस्तां में रमण करती जाती हूँ 

पकङकर हाथ तेरा खुद को बङा महफूज पाती हूँ 

कदम तुझ ओर बढते ही सारे गम पीछे छोङ आती हूँ 

देखकर तेरे नयनो में जमाना भूल जाती हूँ। 

लगकर तेरे सीने से बङा सुकून पाती हूँ 

लेकर अधरो से तेरा नाम इनकी तकदीर संवारती हूँ 

तेरी बांहो के घेरे में अपना घर बनाती हूँ 

तेरे ख्वाबो में खोने खातिर बिन नींद भी सो जाती हूँ 

देखकर तेरे नयनो में जमाना भूल जाती हूँ। 

तेरी चाहत की खुश्बू से अपनी साँसो को महकाती हूँ 

देखती हूँ प्रतिबिम्ब दर्पण में तुझे सामने पाती हूँ 

सोचकर साथ में तुझको मन ही मन हर्षाती हूँ 

प्रति पल तेरे एहसास से प्यार करती जाती हूँ 

देखकर तेरे नयनो में जमाना भूल जाती हूँ। 

          -आस्था गंगवार ©